भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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४३६ [ सातवीं पञ्चिका उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आसृज । निधे हि गोरधि त्वचि ॥ (ऋ० १।२८।६) और इस सूक्त के पहले चार मन्त्रों द्वारा स्वाहा जोड़कर (ऋ० १।२८।१-४) उसने सोम यज्ञ किया । यत्र ग्रावा पृथुबुध्न......(१) यत्र द्वाविव जघना......(२) यत्र नार्य पच्यव......(३) यत्र मन्थां विवध्नते......(४) (ऋ० १।२८।१-४) अब यह अवभृथ अर्थात् यज्ञ की अन्तिम क्रिया के निमित्त सामग्री लाया । और उसने नीचे के दो मंत्रों से आहुतियाँ दीं :— त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्...(४) स त्वंनो अग्नेऽवमो......(५) (ऋ० ४।१।४-५) जब यह कृत्य समाप्त हो गया तो शुनःशेप ने हरिश्चन्द्र को आहवनीय के पास बुलाकर नीचे का मंत्र पढ़ा:— शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्रात्... , ऋ० ५।२।७) अब शुनःशेप विश्वामित्र की गोद में जाकर बैठ गया । सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "ऋषि, मेरे पुत्र को मुझे दो" । उसने कहा, "नहीं । देवों ने इसे मुझे दिया है (अरासत) । तब से उसका नाम "देवरात वैश्वामित्र" हो गया । उसके 'कापिलेय' और 'बाभ्रव' मन्त्र हैं । सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "हम दोनों ( तेरे मा बाप ) तुझे बुलाते हैं । तू आंगिरस गोत्र का अजीगर्त का पुत्र ऋषि है । हे ऋषि, तू अपने बाप दादों के घर को मत छोड़ । हमारे पास आ" । शुनःशेप ने कहा, "मैंने तेरे हाथ में वह चीज देखी है जो शूद्र भी नहीं लेता ( अर्थात् पुत्र के मारने के लिये तलवार ) ।