ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ४४५ मैंने इष्टि की वह मेरी है। मैंने अपनी ही चीज़ की पूर्ति की है, जो तप किया है वह मेरा ही है। अपनी ही चीज़ की आहुति दी है। इस मेरी बात का उपद्रष्टा ( साक्षी ) अग्नि है। उपश्रोता ( सुनने वाला ) वायु है, और आदित्य अनुख्याता है। मैं जो हूँ सो ही हूँ'। जब वह ऐसा कहता है और क्षत्रिय बनकर आहवनीय में आहुति देता है उससे अग्नि तेज नहीं लेता, गायत्री वीर्य नहीं लेती, त्रिवृत् स्तोम आयु नहीं लेता, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति नहीं लेते। (६) २५—यहाँ प्रश्न करते हैं कि जब ब्राह्मण की दीक्षा होने को होती है तो कहा जाता है कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी"। जब क्षत्रिय की दीक्षा हो तो क्या कहना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि कहा तो यही जायगा कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी" लेकिन क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि का नाम लें। ऐसा ही होता है। चूँकि उसने अपने ( क्षत्रियत्व के ) आयुध छोड़ कर ब्राह्मण के आयुध ग्रहण किये और ब्राह्मण हो कर यज्ञ किया इसलिये क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि की दीक्षा का नाम लिया जाता है और उसी का प्रवर कहा जाता है। (७) २६—अब यजमान-भाग का प्रश्न है कि क्षत्रिय खावे या न खावे। अगर खावे तो पापी होवे क्योंकि वह अहुताद है। अगर न खावे तो यज्ञ से अलग हो जाय क्योंकि यजमान- भाग यह है। इसको ब्राह्मण पुरोहित को देना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण क्षत्रिय के पुरोहित की जगह पर है। पुरोहित क्षत्रिय का आधा है, वह अपने मुँह में नहीं खाता तो भी पुरोहित का खाया हुआ उसी के खाये के बराबर हो जाता है। यह जो ब्रह्म है वह साक्षात् यज्ञ है। सब यज्ञ ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित है। यजमान यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है। वह यज्ञ में यज्ञ को डालते