भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पहला अध्याय ] ४५९ त्वामिद्धि हवामहे......(१) स त्वं नश्चित्र......(२) (ऋ० ६।४६।१-२) यह बृहत् पृष्ठ है। बृहत् साम क्षत्र है। क्षत्र से राजा समृद्ध होता है। बृहत् ज्यैष्ठ्य है। इस ज्यैष्ठ्य से राजा समृद्ध होता है। बृहत् श्रेष्ठता है। इस श्रेष्ठता से राजा समृद्ध होता है। "अभित्वासूर नोनुमः" यह रथंतर बृहत् साम का अनुरूप है। यह लोक रथन्तर है, वह लोक बृहत् है। इस लोक का वह लोक अनुरूप है, और उस लोक का यह लोक अनुरूप है। इस प्रकार रथन्तर को बृहत् का अनुरूप बना लेते हैं और दोनों लोकों का यजमान को भोग प्राप्त कर लेते हैं। ब्रह्म रथन्तर है, क्षत्र बृहत् । ब्रह्म में क्षत्र प्रतिष्ठित है। और क्षत्र में ब्रह्म। इस प्रकार दोनों सामों को सयोनिता प्राप्त होती है। धाय्या वही है, यद् वावान (ऋ० १०।७४।६) । इसका ब्राह्मण पहले कहा जा चुका। साम प्रगाथ यह है :- उभयं शृणवच्च न......(१) तं हि स्वराजं......(२) (ऋ० ८।६१।१-२) यह दोनों सामों का रूप है जो गाये जाते हैं। (२) ३-त मुष्टुहि यो अभिभूत्योजा......(ऋ० ६।१८) इसमें 'अभिभूति' में 'अभि' है। 'अषाळ्हम्' 'उग्रं', 'सह- मानम्' क्षत्र के भी रूप हैं। इसमें पन्द्रह मन्त्र हैं। ओज, क्षत्र और वीर्य पन्द्रह अंक वाला है। इस ओज, क्षत्र तथा वीर्य से राजा सम्पन्न होता है। यह भरद्वाज का सूक्त है। बृहत् साम को भी भारद्वाज ने ही निकाला था। और यह आर्ष है। वह राजसूय समृद्ध हो जाता है जिसमें बृहत् होता है। जब