भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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३४ [ प्रथम पञ्चिका लिये भी यह यज्ञ तैयार हो जाता है । ( नीचे का मन्त्र पढ़ने से देव जनता से युक्त हो जाते हैं ) स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन ॥ (ऋ० १०।६३।१५) मरुत देवों की जनता हैं । यज्ञ के आरम्भ में होता इस मंत्र को पढ़ कर उन (मरुतों) को तैयार कर देता है । कहते हैं कि होता (याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में) सब छन्दों के मंत्र बोले । देव सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त हुये । इसी प्रकार यजमान भी सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है । “स्वस्ति नः पथ्यासु” और “स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा” (ऋ० १०।६३।१५, १६) यह दो मंत्र जो “पथ्यायाः स्वस्तेः” अर्थात् मार्ग के कल्याण के लिये हैं, त्रिष्टुभ् छन्द में हैं । “अग्ने नय सुपथाराये अस्मान्” (ऋ० १।१८९।१) और “आ देवाना- मपि पन्थामगन्म” (ऋ० १०।२।३) जो अग्नि के लिये हैं यह दोनों भी त्रिष्टुभ् छन्दों में हैं । “त्वं सोम प्रचिकितो मनीषा” (ऋ० १।९१।१) और “याते धामानि दिवि या पृथिव्यां” (ऋ० १।९१।४) यह दोनों सोम के मंत्र भी त्रिष्टुभ् में हैं । “आ विश्वदेवं सत्पतिं” (ऋ० ५।८२।७) और “य इमा विश्वा जातानि” (ऋ० ५।८२।९) यह दोनों सविता के मन्त्र गायत्री छन्द में हैं । “सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं” (ऋ० १०।६३।१०) और “महीम् षु मातरं सुव्रतानाम्” (अथर्व० ७।६।२) यह दोनों अदिति के मंत्र जगती छन्द में हैं । यह त्रिष्टुभ्, गायत्री और जगती मुख्य छन्द हैं । अन्य छन्द इनके अनुयायी हैं । यही यज्ञ में विशेषतः काम आते हैं । इसलिये जो इस रहस्य को समझ कर इन छन्दों में अनु-

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