भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 482

१६८ [ आठवीं पञ्चिका अंत को सब-आत्मा ( पूरे बल से ) से खड़ा होता है। और सब लोकों में प्रतिष्ठित होता है। उत्तरोत्तर श्री को प्राप्त करता है। जो राजा पुनरभिषेक करके उतरता है वह अपनी प्रजा के ऐश्वर्य और आधिपत्य को प्राप्त कर लेता है। उतर कर पूर्व की ओर मुखकर कुछ तिरछा खड़ा होकर तीन बार कहता है :— नमो ब्रह्मणे, नमो ब्रह्मणे, नमो ब्रह्मणे। फिर कहता है :— ‘वरं ददामि जित्या अभिजित्यै विजित्यै संजित्यै” “मैं जय, अभिजाय, विजय और संजय के लिये वर देता हूँ।” इस प्रकार तीन बार ब्रह्म को नमस्कार करने से क्षत्र ब्रह्म के वश में आ जाता है। इस प्रकार जब क्षत्र ब्रह्म के वश में आ गया तो राष्ट्र समृद्ध होता है और वीरों को उत्पन्न करता है। यह जो कहता है कि “वरं ददामि जित्या......” इससे वह वाणी को निकालता है। क्योंकि 'ददामि' कहने से यह तात्पर्य है कि वाणी को वश में कर लिया। वह सोचकर कि वाणी को जीत लेने से मेरे सब काम ठीक हो जायंगे वह वाणी को बोलता है और फिर उठकर आहव- नीय अग्नि में समिधा रखता है यह पढ़ कर :— “समिदसि सम्मैधैवेन्द्रियेण वीर्येण स्वाहा ।” इस प्रकार वह इंद्रिय और वीर्य से अपने को सम्पन्न करता है। समिधा रखकर तीन पग पूर्व और उत्तर की ओर बढ़ाता और यह पढ़ता है :—