ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ४७५ आज क्षत्रिय पैदा हुआ, विश्व का अधिपति पैदा हुआ, विश और लोगों का भोगने वाला पैदा हुआ, पुरों का नाश करने वाला पैदा हुआ । असुरों का घातक पैदा हुआ, ब्राह्मणों का रक्षक पैदा हुआ, धर्म का रक्षक हुआ !” जब घोषणा हो चुकी तो प्रजापति ने अभिषेक करके इन मन्त्रों को पढ़ा:—(१) १३—निषसाद धृत व्रतो वरुणः पस्त्यास्वा । साम्राज्य्याय (भौज़्याय, स्वाराज्याय, वैराज्याय, पारमेष्ठ्याय, राज्याय, माहाराज्याय, आधि- पत्याय, स्वावश्याय, अतिष्ठाय) सुक्रतुः । (ऋ० १।२५।१०) “धृतव्रत वरुण साम्राज्य इत्यादि के लिये बैठा” । इन्द्र गद्दी पर बैठा था । प्रजापति इन्द्र के सामने खड़ा हुआ और पश्चिम को मुँह करके उदुम्बर और पलाश की भीगी शाखा से उसका आभिषिंचन किया (सिर पर पानी छिड़का ) । नीचे की तीन ऋचाओं ( तृच ) और एक यजु और तीन व्याहृतियों का पाठ करके :— इमा आपः शिवतमा...(ऐतरेय ८।७) देवस्य त्वा सवित...(यजु० १।१०) भूर्भुवः स्वः...(तीन व्याहृतियां) (२) १४—अब वसुओं ने पूर्व दिशा में छः और पच्चीस (३१) दिनों में इन्द्र का अभिषेक किया, उन्हीं तीन ऋचाओं, उसी यजु और उन्हीं तीन व्याहृतियों से । उसके साम्राज्य के लिये । इस लिये इस पूर्व दिशा में राजा लोग साम्राज्य के लिये इन्हीं के द्वारा अभिषेक किया करते हैं और 'सम्राट्' कहलाते हैं । यह देवों का अनुकरण रूप है । इन्हीं ऋचाओं, इसी यजु और इन्हीं व्याहृतियों का पाठ करके ३१ दिन में दक्षिण दिशा में रुद्रों ने इन्द्र का अभिषेक