ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३७ कह कर पुरोडाश को निकालते और आहुति देते हैं तो यजमान उस लोक को चले जाते हैं (प्रयन्ति)। परन्तु इन लोगों का यह कथन अविद्यावश है। प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों के याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में इस प्रकार उलट फेर होना चाहिये कि प्रायणीय इष्टि का अनुवाक्य उदयनीय इष्टि का याज्य मन्त्र हो जाता है और प्रायणीय इष्टि का याज्य मन्त्र उदयनीय इष्टि का अनुवाक्य हो जाता है। होता इस उलट फेर को इसलिये करता है कि दोनों लोकों में समृद्धि प्राप्त हो, दोनों लोकों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो। जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों की समृद्धि और दोनों लोकों की प्रतिष्ठा पा लेता है। अदिति के लिये जो चरु प्रायणीय इष्टि में और जो उदयनीय इष्टि में दिया जाता है, वह यज्ञ के धारण करने के लिये, यज्ञ के बांधने के लिये अर्थात् इसलिये दिया जाता है कि यज्ञ हाथ से निकलने न पावे। किसी ने कहा है कि यह ऐसे ही है जैसे किसी रस्सी के दोनों सिरे बांधने से वह रस्सी हाथ से छूटने नहीं पाती। इसी प्रकार प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों में अग्नि को चरु देकर होता यज्ञ के दोनों शिरों को बांध देता है। 'पथ्या स्वस्ति' के साथ ही उदयनीय इष्टियों में समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार यजमान स्वस्ति के साथ यहां आरम्भ करते हैं और स्वस्ति के साथ वहां (परलोक में) समाप्त कर देते हैं। (५) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त