ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४९८ ) दीक्षणीय इष्टि—यह केवल यज्ञ की तैयारी या भूमिका है । दूरोहण—स्वर्ग या सूर्य्य । व्युत्पत्ति ( ४।२० ) । त्रिष्टुभ्—११-११-११-११ अक्षरों से बने ४४ अक्षरों का छन्द । द्वादशाह—बारह दिनों का कृत्य ( ४।२३ ) । धाय्य—सामिधेनियों के बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र । व्युत्पत्ति देखो ( ३-१८ ) । नभाक—खोदने का कुदाल ( ६।२४ ) । नवनीत—गर्भस्थ जीवों के लिये घी ( देखो घृत ) । निह्नुति—पदों के अन्त के स्वरों की आवृत्ति को कहते हैं ( ५।२ ) । निर्ग्रन्थन—लपेट की गाँठ देना ( ५।१५ ) । निविद्—सोमपान के लिये देवताओं को आवाहन करने वाले ऐसे मंत्र जिनमें देवताओं की स्तुति हो, निविद् कहलाते हैं । ( ३।१० ) । न्यूंख—स्वर को उदात्त कर के पढ़ने की विशेष विधि ( ५।३ ) । न्यून—दस से एक कम=९ ( ६।६ ) । पंक्ति—१०-१०-१०-१० अक्षरों से बने ४० अक्षरों का छन्द । परांचिदिन—अकेले दिन ( ६।१८ ) । पांचजन्य—पांच—देव, मनुष्य, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, पितर ( ३।३१ ) । पुरोगव—नेता ( १।३० ) । पुरोडाश—इष्टियों में दी गई प्रधान हवि जो चावल के आटे को गूँथ कर बनायी जाती है । पहले इसे लकड़ी के टुकड़े पर आह- वनीय अग्नि में पकाते हैं, अन्त में कपालों पर । पुरोरुक्—उच्च स्वर से कहे जाने वाले पद ( तूष्णींशंस का उलटा ) ( २-३६ ) । पृष्ठ—सामवेद के दो तृच् मिल कर पृष्ठ कहलाते हैं ( ३।२१ ) ।