ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ [प्रथम पञ्चिका मन्त्र को पढ़ कर मानो सोम के साथ उसके भाइयों को ले आता है। “दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्” आशीर्वाद है। और “वह हमको सन्तान के सहित धन दे” यह भी आशीर्वाद है। अब होता पढ़ता है :— या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम् । गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान् ॥ (ऋ० १।६१।१६) “तेरे जिन गुणों का हवि द्वारा गान करते हैं वे सब गुण इस यज्ञ में हर जगह आ जावें । हे सोम हमारे घरों में आ । हमारी गायों❀ को बढ़ाता हुआ, रक्षा करता हुआ । वीरों को देता हुआ और वीरों को न मारता हुआ ।” “गयस्फानः प्रतरणः सुवीरः” का तात्पर्य है कि गायों का बढ़ाने वाला और रक्षा करने वाला हो । “अवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान्” का तात्पर्य यह है कि ‘दुर्यान्’ अर्थात् यजमान के ‘घर’ आये हुये सोम राजा से डरते हैं। इस मंत्र को पढ़ कर वह सोम को शान्त करता है जिससे वह शांत हुआ सोम प्रजा और पशुओं की हिंसा न करे । अब होता वरुण सम्बन्धी नीचे के मन्त्र से समाप्त करता है :— इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि । यया- ति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम ॥ (ऋ० ८।४२।३ ) “हे देव वरुण ! शिष्य को बुद्धि, कर्त्तव्यता और होशियारी दो । जिससे हम सब बुराइयों को तर जायं और अच्छी तरह पार करने वाली नाव पर चढ़ें ।” (सोम) जब तक (कपड़े में) ❀ऐतरेय में ‘गयस्फान’ का अर्थ किया है ‘गवां नः स्फावयिता’ ( हमारी गायों को बढ़ाने वाला )। वस्तुतः ‘गय’ का अर्थ है प्राण । ‘गयस्फान’ का अर्थ हुआ ‘प्राण शक्ति को बढ़ाने वाला ।’