भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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तीसरा अध्याय ] ६३ उपद्रव पयसा गोधुघोषमाघर्मैरसंचप्रय उस्रियायाः । विन्नांक्रमरव्यत् सविता वरेण्योन्द्राया पृथिवी सुपर्णीतिः। ( आश्व० ४।७ ) आसुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम्। रसादधीत वृषभम् ॥ ( ऋ० ८।७२।१३ ) आ नूनं खुवर्त्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना। आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत ॥ ( ऋ० ८।५।३८ ) समुत्ये महतीरपः संक्षोणी समु सूर्यम् । सं वज्रं पर्वशो दधुः ॥ ( ऋ० ८।७।२२ ) यह इक्कीस ऋचायें यज्ञ की अनुरूप है। जो यज्ञ का अनुरूप होता है वह समृद्ध होता है। होता (सब के पीछे) खड़ा होकर कहता है :— उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः। घृतेने पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि ॥ ( ऋ० ६।७१।१ ) आगे जाकर कहता है :— प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ( ऋ० १।४०।३ ) खर※ की ओर देखकर कहता है :— गन्धर्व इत्था पदमस्य रक्षति पाति देवानां जनिमान्यद्भुतः।'गृभ्णाति रिपुं निधया निधापतिः सुकृत्तमा मधुनो भक्षमारात ॥ ( ऋ० ९।८३।४ ) नीचे का मंत्र पढ़ कर बैठ जाता है :— ※ खरः प्रवृञ्जनस्थानम् ( सायण ) Alquadrangular mound of earth for receiving the sacrificial vessels ( यज्ञपात्र रखने की चबूतरी )।