ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ [ प्रथम पञ्चिका जब प्रवर्ग्य पात्र रख दिया जाता है तो होता नीचे के दो मंत्रों को पढ़ता है :— श्येनो न योनिं सदनं धियाकृतं हिरण्ययमासदं देव एपति । एरिरन्त बर्हिषि प्रियं गिराऽश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः ॥ (ऋ० ९।७१।६) आस्मिनन्त्सप्तवात्वारोहंतु पूर्व्वारुहः । नृषिहं दीर्घश्रुत्तमं इन्द्रस्य घर्मो अतिथिः ॥ (आश्व० ४।७) दिन के किसी भाग में प्रवर्ग्यपात्र को उठावे, तो यह मन्त्र पढ़ा जाय :— हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यात्यध्वरम् । राजा पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्र भृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत् ॥ (ऋ० ९।८३।५) नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :— सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥ (ऋ० १।१६४।४०) यह जो घर्म है वह देवों का जोड़ा (स्त्री-पुरुष) है । यह जो घर्म पात्र है वह शिश्न (उपस्थ) है । उसके दो शफ (अर्थात् उठाने के दो लोहे के कड़े) अण्डकोश हैं । उपनयमनी (लकड़ी का बना दूध पीने का चमचा) जंघा हैं । कपाल में जो दूध है वह वीर्य है । यह वीर्य उत्पत्ति के निमित्त अग्नि में डाला जाता है क्योंकि अग्नि इन देवों की योनि है । जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करता है, वह अग्नि देवयोनि की आहुतियों में से उत्पन्न होता है क्योंकि अग्नि देव-योनि है । और ऋक् युक्त, यजुर्युक्त, सामयुक्त, वेदयुक्त और ब्रह्ममय, अमर हो जाता है । (५) २३—देव और असुर इन लोकों में लड़ने लगे । असुरों ने इन लोकों को गढ़ बना लिया जैसे शक्तिशाली राजा किया करते