ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ [ प्रथम पञ्चिका दीं, चौबीस हो गईं। चौबीस ही पाख होते हैं। इस प्रकार उन्होंने पाखों से असुरों को निकाल दिया। पाखों से निकल कर असुर 'रात दिन' में चले गये। देवताओं ने कहा "उपसद् आहुतियां दें"। उन्होंने ऐसा ही किया। जो दोपहर के पहले उपसद् आहुति दी उससे तो असुरों को दिन में से निकाला और जो आहुति दोपहर के बाद दी उससे उनको रात से निकाला। इस प्रकार वह असुर रात और दिन दोनों से निकल गये। तब से पहली उपसद् आहुति पूर्वाह्न में दी जाती है और दूसरी अपराह्न में। ऐसा करने से यज्ञ करने वाला, शत्रु के लिये केवल इतना ही स्थान छोड़ता है जितना दिन और रात के बीच में है। (६) २४—उपसद् जितय अर्थात् विजय के देवता हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवों ने पूर्ण विजय पाई और अपने शत्रुओं को नाश कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है वह विजय पाता है और शत्रुओं का नाश करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इन लोकों, ऋतुओं, महीनों, पाखों और रात-दिनों में देवताओं ने जो जो विजय पाई उस सबको प्राप्त कर लेगा। देव डर गये कि कहीं असुरों को उनके वैमनस्य की सूचना मिल जाय और वह उनका राज्य ले लें। वह दलों में बँट गये और सोचने लगे। अग्नि वसुओं के साथ गया और विचारने लगा। इन्द्र रुद्रों के साथ। वरुण आदित्यों के साथ। बृहस्पति विश्वेदेवों की साथ। वे इस प्रकार दल बना कर सोचने लगे। उन्होंने कहा, "हमारे जो यह प्रियतम शरीर हैं उनको राजा वरुण के घर में रख दें। हममें से जो कोई लोभवश ऐसा न करे वह हमारे साथ न चले।" उन्होंने अपने शरीरों को वरुण राजा के घर में रख दिया। राजा वरुण के घर में अपने शरीरों को रखने का नाम ही