भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय ] ८३ भिन्नता कर देता है और उनको उन उन के स्थान में पहुँचा देता है, बिना स्वयं अपने को या यजमान को हानि पहुँचाये हुये । आहुति देते हुये इस मंत्र को बोलता है :— अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद्वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो॑ । यो विश्वतः प्रत्यङ् ङसि दर्शतो रण्वः सन् दृष्टौ पितुमाँ इव क्षयः ॥ ( ऋ० १।१४४।७ ) इससे अग्नि को एक जुष्टि ❀(१) आहुति देता है । जब सोम राजा को ले जाते हैं तो होता नीचे के तीन मंत्र जो गायत्री छन्द में हैं और सोम देवता के हैं पढ़ता है :— (१) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम् । ऋतस्य योनिमासदम् ॥ (२) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे । अनमीवा इषस्करत् ॥ (३) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः । सोमः सधस्थमासदत् ॥ ( ऋ० ३।६२।१३,१४,१५ ) इस मंत्र को पढ़ने से वह सोम को उसी के देवता और उसी के छन्द से बढ़ाता है । ‘सोमः सधस्थमासदत्’ यह अन्तिम शब्द जिनसे प्रकट होता है कि सोम अपने स्थान पर बैठ रहा है होता को उस समय पढ़ने चाहिये जब कि सोम को लिये जा रहे हैं और अग्नीध्र के आगे बढ़ गये हैं तथा होता की पीठ अग्नीध्र की ओर हो गई है । अब विष्णु देवता का नीचे का मंत्र जपता है :— तमस्य राजा वरुणास्तमश्विना ऋतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः । दधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखियाँ अपोर्णुते । ( ऋ० १।१५६।४ ) ❀हौग ने जुष्टि का अर्थ किया है- ‘as a favour’ or रियायती । सायण कहता है कि यह आहुति ‘अग्ने प्रियं’ अग्नि को प्रिय लगने के लिये है ।