भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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९२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वविशेषापोहसंवेद्यं सर्वशब्दप्र- | समस्त विशेषोंका बाध करके जानने त्ययागोचरम्। तदत्यन्तविशुद्ध- | योग्य है तथा सब प्रकारके शाब्दिक प्रज्ञोपाधिसंबन्धेन सर्वज्ञमीश्वरं | ज्ञानका अविषय है, अत्यन्त विशुद्ध सर्वसाधारणाव्याकृतजगद्बीजप्र- | प्रज्ञारूप उपाधिके सम्बन्धसे सर्वज्ञ वर्तकं नियन्तृत्वादन्तर्यामिसंज्ञं | तथा जगत्के सर्वसाधारण और भवति। तदेव व्याकृतजगद्बीज- | अव्यक्त बीजका प्रवर्तक वह ईश्वर भूतबुद्ध्यात्माभिमानलक्षणहिर- | ही सबका नियन्ता होनेके कारण ण्यगर्भसंज्ञं भवति। तदेवान्त- | 'अन्तर्यामी' नामवाला है; वही रण्ड़ोद्भूतप्रथमशरीरोपाधिम- | व्याकृत जगत्का बीजभूत विज्ञाना- द्विराट्प्रजापतिसंज्ञं भवति। | त्माका अभिमानी 'हिरण्यगर्भ' तदुद्भूताग्न्याद्युपाधिमद्देवतासंज्ञं | नामवाला है तथा वही ब्रह्माण्डके भवति। तथा विशेषशरीरोपाधि- | भीतर सबसे पहले उत्पन्न हुए ष्वपि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु | शरीररूप उपाधिवाला 'विराट् प्रजा- तत्तन्नामरूपलाभो ब्रह्मणः। | पति' संज्ञावाला है। वही उससे तदेवैकं सर्वोपाधिभेदभिन्नं | उत्पन्न हुए अग्नि आदिकी उपाधि सर्वैः प्राणिभिस्तार्किकैश्च सर्व- | से 'देवता' संज्ञावाला है तथा उस प्रकारेण ज्ञायते विकल्प्यते चा- | ब्रह्मको ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त नेकधा। "एतमेके वदन्त्यग्निं | विशेष-विशेष शरीरोंकी उपाधियोंमें मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे | भी उन-उनके नाम और रूप प्राप्त प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्"(मनु० | हुए हैं। सम्पूर्ण उपाधिभेदसे विभिन्न १२।१२३) इत्याद्या स्मृतिः॥३॥ | वही एक समस्त प्राणियों और | तार्किकोंद्वारा सब प्रकारसे जाना | जाता और अनेक प्रकारसे कल्पना | किया जाता है। [इस विषयमें] | "इसे कोई तो अग्नि बतलाते हैं तथा | कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, | कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म | कहते हैं" इत्यादि स्मृति भी है॥३॥