ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७ “आत्मा वा इदमेक एवाग्र | “निश्चय पहले एक आत्मा ही था” आसीत्” (१।१।१) इति “ब्रह्म | तथा “[ उसने ] ब्रह्मको [ आकाशके ततमम्” (१ । ३ । १३) इति | समान ] अतिशय व्याप्त [ जाना ]” । चोक्तम् । अन्यत्र च । | ऐसा भी कहा है और [ ऐसा | ही ] अन्य उपनिषदोंमें भी | कहा है। सर्वगतस्य सर्वात्मनो बालाग्र- | पूर्व०-उस सर्वगत सर्वात्माके [ प्रवेशश्रुति-विचारः ] मात्रमप्यप्रविष्टं | लिये तो बालका अग्रभाग भी अप्रविष्ट नास्तीति कथं सी- | नहीं है; फिर वह चींटीके बिलप्रवेश- मानं विदार्य प्रापद्यत पिपीलि- | के समान मूर्धसीमाको विदीर्णकर केव सुषिरम् । | किस प्रकार मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट | हुआ ? नन्वत्यल्पमिदं चोद्यं बहु | सिद्धान्ती-तुम्हारा यह प्रश्न तो | अल्प है । अभी तो उपर्युक्त कथनमें चात्र चोदयितव्यम् । अकरणः | बहुत कुछ पूछनेयोग्य बातें हैं। सन्नीक्षत । अनुपादाय किंचि- | ‘उसने इन्द्रियहीन होकर भी ईक्षण | किया । किसी उपादानके बिना ही ल्लोकानसृजत । अद्भ्यः पुरुषं | लोकोंकी रचना की। जलमेंसे पुरुष समुद्धृत्यामूर्छयत् । तस्याभिध्या- | निकालकर उसे अवयवयोजनाद्वारा | पुष्ट किया। अभिध्यानके द्वारा उसका नान्मुखादि निर्भिन्नं मुखादि- | मुख प्रकट हुआ तथा मुखादिसे भ्यश्चाग्न्यादयो लोकपालास्तेषां | अग्नि आदि लोकपाल प्रकट हुए । | उनका क्षुधा-पिपासादिसे संयोग चाशनायापिपासादि संयोजनं त- | कराना, उनका आयतनके लिये दायतनप्रार्थनं तदर्थं गवादि- | प्रार्थना करना, उसके लिये गौ आदि ऐतरेयो० ३—