ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५ ननु पाक्षिकत्वेन प्रत्युक्तं | पूर्व०-परन्तु इस विरोधको तो त्वया । | तुमने पाक्षिक बतलाकर खण्डित | कर दिया है । .न; नित्यमेव श्रोतृत्वाद्यभ्यु- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि आत्मा- पगमात् । “न हि श्रोतुः श्रुते- | का श्रोतृत्व आदि तो नित्य ही माना र्विपरिलोपो विद्यते” ( बृ० उ० | गया है, जैसा कि “श्रोताकी श्रुति- ४ । ३ । २७) इत्यादिश्रुतेः । | का लोप कभी नहीं होता ” इत्यादि | श्रुतिसे सिद्ध होता है । एवं तर्हि नित्यमेव श्रोतृ- | पूर्व०-ऐसी दशामें तो आत्माका त्वाद्यभ्युपगमे प्रत्यक्षविरुद्धा | नित्य श्रोतृत्वादि माननेपर प्रत्यक्ष- युगपज्ज्ञानोत्पत्तिरज्ञानाभावश्चा- | विरुद्ध अनेक ज्ञानोंका एक साथ त्मनः कल्पितः स्यात् । तच्चा- | उत्पन्न होना और आत्मामें अज्ञानका निष्टमिति । | अभाव ये दो बातें माननी पड़ेंगी । | किन्तु यह किसीको अभीष्ट नहीं है । नोभयदोषोपपत्तिः। आत्मनः | सिद्धान्ती-इन दोनों दोषोंकी | सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि श्रुत्यादिश्रोतृत्वादिधर्मवत्त्वश्रुतेः। | श्रुतिके कथनानुसार आत्मा श्रुति आंनत्यानां मूर्तानां च चक्षुरा- | आदिके श्रोतृत्वारि धर्मवाला है* | जिस प्रकार अग्निका प्रज्वलित दीनां दृष्टचाद्यनित्यमेव संयोग- | होना, तृणादिके संयोगसे होनेके वियोगधर्मिणाम्, यथाग्नेर्ज्वलनं | कारण, अनित्य है; उसी प्रकार | संयोग-वियोगधर्मी, मूर्त्त एवं अनित्य तृणादिसंयोगजत्वात्तद्वत् । न तु | चक्षु आदिके धर्म दृष्टि आदि नित्यस्यामूर्त्तस्यासंयोगवियोगध- | अनित्य ही हैं । किन्तु जो नित्य, | अमूर्त्त और संयोग-वियोग-धर्मसे
- अर्थात् वह श्रुतिका श्रोता, मतिका मन्ता तथा विज्ञाता आदि रूपसे प्रसिद्ध है ।