भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९ वामदेवकी उक्ति एवं संसरन्नवस्थाभिव्यक्ति- | इस प्रकार संसरण करता [अर्थात् | संसारमें उत्पन्न होता] हुआ और त्रयेणं जन्ममरणप्रबन्धारूढः सर्वो | अवस्थाकी तीन अभिव्यक्तियोंके | क्रमसे जन्म-मरणरूप परम्परापर लोकः संसारसमुद्रे निपतितः | आरूढ़ हुआ सम्पूर्ण लोक संसार- | समुद्रमें पड़ा-पड़ा जिस समय किसी कथंचिद्यदा श्रुत्युक्तमात्मानं | प्रकार जिस-किसी अवस्थामें भी अपने | श्रुतिप्रतिपादित आत्माको जान लेता विजानाति यस्यां कस्यांचिद- | है उसी समय वह सम्पूर्ण संसार- वस्थायां तदैव मुक्तसर्वसंसार- | बन्धनोंसे मुक्त होकर कृतकृत्य हो बन्धनः कृतकृत्यो भवतीति- | जाता है- तदुक्तमृषिणा—गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥ यही बात ऋषि (मन्त्र) ने भी कही है—'मैंने गर्भमें रहते हुए ही इन देवताओंके सम्पूर्ण जन्मोंको जान लिया है। [ तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व ] मुझे सैकड़ों लोहमय ( लोहेके समान सुदृढ़ ) शरीरोंने अवरुद्ध किया हुआ था। अब [ तत्त्वज्ञानके प्रभावसे ] मैं श्येन पक्षीके समान [ उनका छेदन करके ] बाहर निकल आया हूँ'—वामदेवने गर्भमें शयन करते समय ही ऐसा कहा था ॥ ५ ॥ एतद्वस्तु तदृषिणा मन्त्रेणा- | यही बात ऋषि यानी मन्त्रने प्युक्तमित्याह— | भी कही है, सो बतलाते हैं— गर्भे नु मातुर्गर्भाशय एव | 'गर्भे नु'—माताके गर्भमें सन् । न्विति वितर्के । अनेक- | रहते हुए ही—यहाँ 'नु' शब्द