ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ ५ ] स्थित है, प्रज्ञानसे ही प्रेरित होनेवाला है और स्वयं भी प्रज्ञानस्वरूप ही है, तथा प्रज्ञान ही ब्रह्म है। जो इस प्रकार जानता है वह इस लोकसे उत्क्रमण कर उस परमधाममें पहुँच समस्त कामनाओंको प्राप्तकर अमर हो जाता है। यही इस उपनिषद्का सारांश है। इसका प्रधान उद्देश्य ब्रह्मका सर्वात्म्य-प्रतिपादन ही है। आदिसे अन्ततक इसका यही उद्देश्य रहा है। प्रथम अध्यायमें देवताओंके आयतन याचना करनेपर उन्हें क्रमशः गौ और अश्वके शरीर दिखलाये गये; परन्तु उन्हें वे अपने अनुरूप प्रतीत न हुए। उसके पश्चात् मनुष्य-शरीर दिखलाया गया। उसे देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे ही अपने आयतनरूपसे स्वीकार भी किया। देवताओंकी उत्पत्ति विराट् शरीरके अवयवोंसे हुई थी; अतः विराट्के अनुरूप होनेके कारण उन्हें मानव-शरीर ही आयतनरूपसे ग्राह्य हुआ। इससे यही सिद्ध होता है कि मानव-शरीर ही जीवके परमकल्याण- का आश्रय है; उसमें स्थित होनेपर ही वह परमपद प्राप्त कर सकता है। अकारणकरुणामय श्रीभगवान्की कृपासे हमें वह परमलाभ प्राप्त करनेका सौभाग्य हुआ है, अतः हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि यह अत्यन्त दुर्लभ सुअवसर निष्फल न हो जाय। अनुवादक