भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद ८६ सबका ध्यान आपकी तरफ था फारस का बादशाह बीरबल की बुद्धि की बड़ी प्रशंसा सुना करता था इसलिये उसे बीरबल को देखने के लिये उत्कट इच्छा हुई। अकबर के पास एक पत्र लिख कर भेजा उस में बीरबलके बुलाने की बात लिखी थी। वह अहल्कार कई दिन की मंजिल तय कर दिल्ली पहुँचा और बादशाह को अदब से सलाम कर फारस के बादशाह का भेजा हुआ पत्र दिखलाया। अकबर बादशाह पत्र पढ़कर बहुत खुश हुआ और अहल्कार को अपनी सराय में आराम करने की आज्ञा दी। वहाँ उसके आराम की सभी वस्तुएँ प्रस्तुत थीं। दूसरे ही दिन बादशाह ने बड़े ठाटबाट के साथ बीरबल को फारस भेज दिया। बीरबल फारस पहुँचकर शहर के बाहर एक बाग़ में अपना डेरा खड़ा कराया और उस अहल्कार को अपने आने की सूचना देनेके लिए फारस के बादशाह के पास भेजा। जब बादशाह ने सुना कि बीरबल नगर के बाहर मेरे हुक्म की इन्तजार कर रहा है, तो उसने अपने समस्त कर्मचारियों को अपने ही सा वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करा सबके सहित दरबार में जा बैठा और बीरबल को आने की आज्ञा दी। अहल्कारे से बादशाह के बुलावे का पत्र पाकर बीरबल राजभवन में उस से मिलने आया। वहाँ की अजीब हालत थी, सब लोग एक ही तरह की पोशाक पहने हुए यत्रतत्र बैठे थे। बीरबल एक तरफ से सबको लक्ष करता हुआ धीरे २