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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद ८८

ढूँढ ला जो सब सयानों का सरताज हो ?” बीरबल किसी बात से भला कब हताश होने वाला था, उसने झट उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ ! शीघ्रातिशीघ्र ढूँढ़कर हाजिर करूँगा। परन्तु इस काम में दस हजार रुपयों की आवश्यकता है।” बादशाह की आज्ञा से बीरबल को तत्काल दस हजार रुपयों की थैली दी गई। बीरबल रुपयों को लेकर अपने घर चला गया। थैली घर पर रख आप “सौ सयाने का एक सयाना” की फिराक में शहर की गलियों को छानने लगा। मशाल मशहूर है-“जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।” दैवात उसे एक अहीर मिला। उसको दिहाती चतुर देख बीरबल ने उसे अपने पास बुलाकर उसके कान में समझाया-“देखो यदि तुम मेरे कहने के अनुसार करोगे तो मैं तुझे एक सौ रुपया इनाम दूँगा ?” ग्वाला भला काहे को इन्कार करता, बिचारे ने इकट्ठी सौ रुपयों की गुल्ली आजन्म में नहीं देखी थी। उसको अपने अनुकूल समझ कर बीरबल बोला-“देखो मेरे साथ तुम्हें बाद- शाह के पास चलना होगा, यदि बादशाह तुमसे कुछ पूछें तो एकदम चुप रहजाना। वह बोला-“बहुत अच्छा ऐसाही करूँगा।” बीरबल उस अहीर को अच्छे २ वस्त्रों से सुसज्जित कर शाही दरबार में ले गया और बादशाह के समक्ष खड़ाकर बोला- “पृथिवीनाथ ! आपकी आज्ञानुसार सयाना मनुष्य हाजिर है उसकी परीक्षा कर लें।” बादशाह उसे और समीप खड़ा करा कर यों प्रश्न करना प्रारम्भ किया-“तुम कहाँ रहते हो ? तुम्हारे माता-पिता तुमको किस नाम से पुकारते हैं ? कौनसी बात

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