अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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को देखकर मन में बड़ा प्रसन्न हुआ, प्रगट में बोला- "बीरबल ! ज़रा उस ताख पर का सेब तो लेते आना उसके लिये मैं बड़ी देर से इन्तजार कर रहा हूँ।" सेब पहले से इसी अभिप्राय से रक्खा गया था; जिससे बीरबल का हाथ आसानी से उस वैज्ञानिक ताख में फँसाया जा सके। सन्देह हो जाने पर बीरबल हाथ में आने वाला असामी नहीं था। आज्ञा पालन कर बीरबल सेब लेने के अभिप्राय से ताख पर अपना हाथ बढ़ाया। सेब पर पहुँचने से पहले ही उसका दाहिना हाथ उस ताख से चिपक गया। तब बीरबल ने अपना दूसरा हाथ पहले हाथ को छुड़ाने के अभिप्राय से लगाया। वह भी उसी में फँस गया, बीरबल बहुत घबड़ाया और मारे लज्जा के उसका सिर नीचा हो गया। बादशाह ने विचार किया कि बीरबल अभी तक नहीं आया, ताख में फँस कर घबड़ाता होगा इसलिये उसे छुड़ाना चाहिये। वह टहलता हुआ उसके पास गया और बीरबल को ताख में फँसा हुआ देखकर बोला-"क्या खूब ! मेरी चीजें बराबर चोरी जाया करती थीं परन्तु मुझे चोर का पता नहीं चलता था, आज सौभाग्यवश चोर की गिरफ्तारी हो गई है। जावो बीरबल ! तुम्हारा यह पहला कसूर समझकर माफी देता हूँ, लेकिन फिर कभी ऐसा काम न करना।" बीरबल इस घटना से बड़ा लज्जित हुआ और उसके मुखसे कोई जवाब न निकला-तब बादशाह ने अपने राजगीरों को आज्ञा देकर उसका हाथ छुड़वा दिया। अब बीरबल को