अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद ११६ निकलने का कोई रास्ता नहीं मालूम था । दैवात् बादशाह को जोर से टट्टी लगी। वह घोड़े को एक पेड़ से बाँध कर घनी झाड़ियों की तरफ गया और पाखाने फिरने लगा । एक भयानक भेषधारी-राक्षस रूप, काला भुशुण्ड, बाल बढ़ाये, बड़े-बड़े दाँत आगे को निकाले विहंगम डीलडौल का दिखलाई पड़ा। वह डाकता कूदता तथा उछलता हुआ दहाड़ने लगा। थोड़ी देर बाद वह बादशाह के समीप आ पहुँचा और अपनी तेज आँखों से घूर कर बोला-“तू बड़ा प्रजापीड़न करता है; अतएव आ कर मेरा भक्ष बन !” उसका इतना कहना था कि बादशाह एकदम भयकातर हो गया और काँपता हुआ उस देव से बोला-“हे देव ! मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से फिर प्रजा को कभी न सताऊँगा, आप कृपा कर मुझे जीता-जागता छोड़ दीजिये ।” तब उस देव से अधिक कुछ करते न बना और बादशाह से कहा-“अब तेरे प्राण बचने का एकमात्र यही साधन है कि तू मेरे जूतों को अपने शिर पर रखकर एक फर्लाङ्ग मेरे साथ चले, अन्य कोई उपाय मेरे पास नहीं है यदि जान बचाना चाहता है तो आगे आ। 'मरता क्या न करता' बिचारा बादशाह उसकी लाल पीली आँखें देखकर थरथर काँप रहा था। डरवश उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया । बादशाह को जूता ढोने पर उद्यत देख विशालकाय दैत्य को दया आ गई और उसे बिना किसी प्रकार का दण्ड दिये ही छोड़ दिया । बादशाह नगर को चला गया- बीरबल की छुट्टी पूरी हो चुकी थी अतएव अपनी ड्यूटी