अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३३ अकबल बीरबल विनोद इन तीनों की उपरोक्त गुप्त वार्ता सुनकर बादशाह लौट गया और दरबार में पहुँच कर समस्त दरबारियों के सामने इस बात की चर्चा की और उसका अर्थ भी पूछा—"वह आये।” “वह नहीं हैं।” “और यह भी होता है वह भी होता है।” ऐसी भेदभरी बातें सुनकर सब लोग चकित होकर बादशाह का मुह देखने लगे। कितने दरबारियों ने तो लज्जा वश अपनी गरदन नीची कर ली और नाखून से जमीन कुरेदने लगे। जब बादशाह ने देखा कि इनसे कोई मतलब नहीं निकलेगा तो वह बीरबल को बुलवाया और उससे भी ऊपर कही बातें सुनाकर उसका अर्थ पूछा। बीरबल ने कहा—"गरीब परवर ! यह वार्ता किसी मूर्ख पर छिड़ी थी। प्रश्नका तात्पर्य यह निकलता है कि किसी सभ्य के घर उसकी अनुपस्थिति में जाना उचित नहीं है और यदि कोई हठकर मूर्खतावश जावे ही और उसके घर वाले उसके लिये ऐसा कहें तो समझना चाहिये, "वह आये" यानी बैल राज आये। "वह नहीं है।" याने इनको सींग नहीं है। "यह भी होता है और वह भी होता है" "का यह अभिप्राय है कि किसी २ बैल को सींग रहती है और किसी किसी को नहीं भी।" बादशाह बीरबल के ऐसे सारगर्भित उत्तर को सुनकर शरमिन्दा हुआ और उसने मन में ऐसी गुस्ताखी आगामी कभी न करने का प्रण कर लिया। —०*०—