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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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१३५ अकबर बीरबल विनोद कभी उससे मित्रता न की। इधर से दिल का झुकाव हट जाने से उसका मन निजी कारोबार में लग गया। बादशाह ने बीरबलकी इस बुद्धिमत्ता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे खुश करने के लिये बहुत सा पुरस्कार दिया। मट्ठीचूस का द्रव्य । दिल्ली नगर एक बड़ा शहर है, उसमें सभी श्रेणी के मनुष्य निवास करते हैं। इसी शहर में एक अति दीन मनुष्य भी रहता था। यह बड़ा कंजूस था। कंजूसी के कारण धीरे २ इसके पास बहुतेरी मुहरें इकट्ठी हो गईं । जब उसे मुहरों को घर में रखने से चोरी हो जाने की आशंका हुई तो उन को एक छोटे से बक्स में बन्द कर एक विस्तृत मैदान में आशापल्लव के नीचे गढ़ा खोदकर गाढ़ आया ताकि उसे कोई चुरा न सके। उसकी देखरेख करने के लिये कभी २ उस वृक्ष तले जाकर गुपचुप लौट आता। एक दिन उसका द्रव्य वहाँ से गायब हो गया, और जब वह नित्य के अनुसार पेड़तले अपना द्रव्य देखने गया तो क्या देखता है कि वह जगह खुदी पड़ी है, वहाँ द्रव्य का नामो- निशान तक नहीं है। मारे चिन्ता के छाती पीट २ कर रोने और चिल्लाने लगा। इस प्रकार बड़ी देर तक कुँहुक २ कर रोता रहा, जब थककर लाचार हो गया तो हृदय को ढाढ़स देते हुए कुछ शान्त हुआ। वह रात्रि चिन्तना करते ही बीत गई। दूसरे दिन साहस कर बादशाह की अदालत में गया। वहाँ के कुछ दरबारियों की सम्मति से

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