भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद १४२ बिलखता हुआ बीरबल के घर पहुँचा। उसका आद्योपान्त समाचार सुनकर बीरबल ने उसे ढाढ़स दिया और उसे चुपचाप घर जाकर बैठने की सम्मति देकर बिदा किया। दूसरे दिन जब बीरबल को दरबार जाने का समय हुआ तो एक नई तरकीब सोच कर निकाली। मार्ग में एक नदी का तट मिला वहीं पर रुककर झटपट पड़ोस के गाँव से एक बड़ा लम्बा बाँस मँगवाया और उसके सिरेपर एक काली हड़िया बाँधकर उसमें पानी और थोड़ा दाल चावल छोड़कर बाँस के तने को जमीन पर गाड़ दिया और उससे सटकर आग जलाना शुरू किया। जब दरबार के समय बादशाह अपनी सभा में आया तो बीरबल अनुपस्थित था वह उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा। जब इस प्रकार घंटों हो गया और बीरबल नहीं आया तो उसे चिन्ता हुई और तुरत बीरबल को बुलाने के लिये एक द्रुतगामी दूत को भेजा। बीरबल के घर पहुँच कर उस सिपाही को विदित हुआ कि बीरबल नदी तट पर किसी कार्य्य वश गया है। वह सीधे नदी तट की तरफ मुड़ा और वहाँ पहुँच कर बीरबल से बादशाह की आज्ञा सुनाकर बोला-"आपको बादशाह शीघ्र बुला रहे हैं।" बीरबल ने कहा-"भाई थोड़ी सबर कर फिर चलता हूँ।" सिपाही बोला-"यह आप क्या कर रहे हैं?" बीरबल ने उत्तर दिया-क्या तू इतना भी नहीं समझता, मैं खिचड़ी पका रहा हूँ।" सिपाही बीरबल के चरित्रों से परिचित था अतएव उसने उसमें कुछ रहस्य की बात समझकर हँसता