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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद १५४ की दरगाहपर सिरनी चढ़ाऊँगा। एक दिन जब वह सबेरे सोकर उठा तो उसके मन में एकाएक पीर की दरगाह पर जाने की समाई, तुरत चन्द मुसाहिबों के साथ सवारी पर चढ़कर वहाँ पहुँचा। वहाँ की कुछ और ही हालत हो रही थी; कितने ही लोगों की भीड़ लगी हुई थी। एक छोटी सी बाजार लग थी। बादशाह को उस स्थान के देखने से बड़ी प्रसन्नता हुई। वह अपने दरबारियों के सहित यकीनशाह पीर को बड़ी विनम्रता से प्रणाम किया। बीरबल चुपचाप खड़ा रहा। बादशाह ने बीरबल से कहा-“सब लोगों ने तो पीर को प्रणाम किया परन्तु तुमने नहीं सो क्यों। तुम्हें भी मुना- सिब है कि पीर साहब को प्रणाम करो।” बीरबलने कहा- “मैं प्रणाम करने को तय्यार हूँ, परन्तु आपको भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी, यानी पीरसे आस्था को ही प्रधान कहना पड़ेगा।” बादशाह ने उत्तर दिया-मैं इस समय भी यही कहने को प्रस्तुत हूँ कि आस्था से पीर बड़ा है और तुम्हारे सामने ही इस बात की मनौती भी करता हूँ कि यदि मैं प्रतापसिंह पर विजय प्राप्त कर लूँगा तो इस कबर पर मखमली चादर बिछाऊँगा और मलीदा चढ़ाकर यहीं पर मौलवी और फकीरों को खाना खिलाऊँगा।” बादशाह और दीवान इस विषय पर वाद- विवाद कर ही रहे थे कि उसी के दरम्यान एक सवार तेजी से घोड़ा दौड़ाता हुआ आया और बादशाह को सलाम कर बोला-“पृथ्वीनाथ! शाहजादा सलीम ने कहलाया है कि मेवाड़ का राजा प्रतापसिंह ने अपनी हार स्वीकार कर ली है