अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ अकबल बीरबल विनोद वे सब कुछ देर तक इसी चिन्ता में डूबे रहे, अन्तमें उनका ध्यान ईश्वर प्रार्थना की तरफ झुका और अपने मुक्त होने के लिये ईशवन्दना करने लगे । “हे भगवन् ! क्या हम इस बन्धन से मुक्त न किये जायँगे ! क्या हमारा जन्म इसी किले में बन्द रहकर कष्ट भोगने ही के लिये हुआ था ! आप दीना- नाथ बजते हैं, अपना नाम याद कर हम असहायों की वेगि सुधि लीजिये ।” जैसे २ उनकी मुक्त होने की आशा विलीन होती गई तैसे २ नित्य परमेश्वर से उस किले के टूटने के लिये प्रार्थना करने लगे । ईश्वर की दयालुता प्रसिद्ध है-एक दिन बड़े जोरों का भूकम्प आया और किले का कुछ भाग भूकम्प के कारण धराशायी हो गया। सामने का पर्वत भी टूटकर चकनाचूर हो गया। इस घटना के पश्चात् एलची ने बादशाह के पास किला टूटने की सूचना भेजी। बादशाह को अपने बचन का स्मरण हो आया। इसलिये उस एलची को उसके साथियों सहित दर्बार में बुलवा कर बोला-“आपको अपने बादशाह का आशय विदित होगा और अब उसका उत्तर भी तुमने समझ लिया है, यदि न भी समझे हों तो सुनो, मैं उसे और भी स्पष्ट किये देता हूँ। देखो तुम लोग गणना के केवल सौ ही मनुष्य हो, परन्तु तुम्हारी आह से ऐसा सुदृढ़ किला ढह गया, फिर जहाँ हजारो मनुष्यों पर अत्याचार हो रहा है वहाँ के बादशाह की आयु कैसे बढ़ेगी, बल्कि दिनोंदिन घटती ही जायगी और यथाशीघ्र लोगों की आह से उसका पतन हो जायगा। तब बादशाह की आयु