अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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माफ कर दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! मरते को मारना अच्छा नहीं, आप तुरत मुझे मारे जाने की आज्ञा दीजिये।” बादशाह ने कहा-अच्छी बात है, तब तो आगे ही आ रहा है।” बादशाहने वधिक को बीरबल को फाँसीघर ले जाने की आज्ञा दी। वह घर मकान के चौक के पास ही बना हुआ था। बीरबल की यह दशा देख समस्त प्रजा घबड़ा उठी क्योंकि बीर- बल।के समय में सबको रामराज्य था। न राजा का जुल्म प्रजा पर चलने पाता था और न प्रजा का राजा पर। सबके चेहरे पर मुरदनी छा गई। बीरबल के घर वाले भी चुपचाप मलीन मुख किये सब कार्य कलाप देख रहे थे, वे अब अपना धैर्य कायम न रख सकें और सबके सब सुसक सुसक कर रोने लगे। बीरबल फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया गया। नियम के अनुसार वधिकों ने बीरबल से पूछा-“आप की अन्तिम इच्छा क्या है, उसको पूरी करने के लिये दस मिनट का समय और दिया जाता है। बीरबल अभी कुछ कहने भी नहीं पाया था कि एक फकीर प्रगट हुए। उनको आते किसी ने नहीं देखा था जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो जमीन को फाड़ कर प्रगट हुए हों। फकीर ने कहा-“बीरबल ! यह तुम्हारे फाँसी का समय है अतएव मरने से पहले एक पुण्य कर्म करता जा। यह सबेरे सबेरे का समय है और मुझे भूख बहुत लगी है इससे तू मेरे भोजन का प्रबन्ध कर। इससे बढ़कर दूसरा दान नहीं है, सा सदा ऐसे लोग कहते आये हैं। मैं मछली खाना चाहता हूँ, इसलिये एक अच्छी मछली पका कर खिला