अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद १९६ बीरबल बोला—"पृथ्वीनाथ ! हम लोग कविवर के बड़े आभारी हैं क्योंकि इन्होंने अपनी जानपर खेलकर हज़ारों की प्राणरक्षा की है। हम इस बात से भली भाँति परिचित हैं कि आप परिणामदर्शी हैं, इसलिये उन्हें मरने न देंगे। यदि बीच में हमलोग आप से कोई छेड़ छाड़ करते तो आपकी क्रोधाग्नि और भी भड़क जाती, फिर उस समय हमलोगों के सँभाले न सँभलती, इन्हीं सब परिणामों पर दृष्टिपात कर सब लोग खामोश रह गये।" फिर यह काम समाप्त कर बादशाह पिछड़े राजकीय कामों के करने में तत्पर हुए और पहले के समान बराबर दर्बार में उपस्थित होकर सारे पिछड़े हुए कामों को थोड़े दिनों में ही सँभाल लिया। दर्बारियों की इस चातुर्य्यता से, आतंक फैलाने वालों का शिर नीचा होगया। सबसे प्यारी वस्तु एक दिन बादशाह जनाने महल में अपने सबसे प्रिय बेगम से कुछ बातें कर रहा था। बात बात में कोई ऐसा विषय आगया जिससे कि वह सिरसे पैर तक बेगम से फिरन्ट हो गया और उसे आज्ञा दी कि तुम आज शाम तक महल खाली कर दो। बेगम विचारी ने यद्यपि बादशाह के गुस्से को शान्त करने के लिये बहुतेरा प्रयास किया; परन्तु सब निष्फल गया। बादशाह उसी क्रोधावेश में महल से बाहर चले गये। बेगम भय से थरथर काँपने लगी। जब अपने बचाव के लिये बहुत मूड़मार कर भी कोई युक्ति न निकाल सकी तोउसका ध्यान बीरबल की तरफ गया। उसने दासको