अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०५ अकबर बीरबल विनोद अपनी समझ से किसे उपयुक्त समझते हो।" नाई ने उत्तर दिया- "पृथ्वीनाथ ! मेरी समझ से तो इस काम के उपयुक्त अ-अ-अ-अरे हां, अच्छा बतला दूँ, हाँ ! बीरबल है, आगे आपकी इच्छा चाहे जिसको भेजें।" बादशाह ने कहा- "कहता तो तू बहुत ठीक है; परन्तु एक बात फिर भी बड़े अड़चन की आ पड़ती है, बीरबल के जानेके बाद यहाँका कार्य कौन सँभालेगा।"नाई बोला-इसमें कौनसी बड़ी बात है, उस जगह पर अल्प काल के लिये कोई दूसरा ही आदमी नियुक्त कर दिया जायगा। यदि आप वह पद मुझे देना चाहें तो उतने समय तक मैं ही संभाल दूँगा।" बादशाह हँस पड़े और बोले- "शाबस बच्चे ! कैसा मुँहमें पानी भर आया ?" तुमको भी दीवान पद के लिये उत्कण्ठा हो गई।" नाई कुछ सिटपिटा गया, परन्तु फिर भी मुँह आछत कायल होना अच्छा नहीं समझता था। उसने कहा- "पृथ्वीनाथ ! इसमें कोई ऐसी बात नहीं है; मैं तो योंही कह रहा था। यदि आप कहेंगे तो मैं ही चला जाऊँगा परन्तु मैं जरा वैसा आदमी हूँ। यदि आप किसी को कत्तई न भेजेंगे तो आप पर पितृऋण बना ही रह जायगा। मुझे विश्वास पड़ रहा है कि जब आप बीरबलको जाने की आज्ञा देंगे तो वह अनेक प्रकार से निबुकने की कोशिश करेगा, परन्तु अपनी बात पर दृढ़ होकर अड़ जायँगे तो जाने के लिये उद्यत होगा। बड़े बूढ़ों की प्रसन्नता के लिये किसी न किसी को भेजना बहुत जरूरी है, आगे आप स्वयं मुख्तार हैं। बीरबल ने नाई की अपील मंजूर करली और उसे घर जाने की आज्ञा