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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद २१० ग सके । दरबार में पहुँचकर बीरबल बादशाहके सामने खड़ा होगया। जब बादशाह उसे न पहचान सके तो वह स्वयं बोला- "पृथ्वीनाथ! मेरा नाम बीरबल है, मैं आपकी आज्ञानुसार आपके पित्रों से मिलकर वापस आया हूँ।" बादशाह उस को भली- भाँति देखकर बोले- "वाहजी बीरबल, क्या तुम लौटकर आ गये ? जरा मेरे पित्रों का समाचार वर्णन करो, वे प्रसन्न तो हैं न ?" बीरबल ने कहा- "भला उनका क्या कहना है, आपके पुण्य प्रभाव से वे बड़े आनन्द से हैं, जब मैंने उनको आपका कुशल समाचार सुनाया तो वे बड़े हर्षित हुये और मुझे आपका दीवान जानकर तो मुझसे इतना प्रेम करने लगे कि मैं यहाँ आकर भी उन्हीं के प्रेम में विह्वल हो रहा हूँ। उनका सुख इन्द्रके सुखभोग को भी लजाने वाला है। वहाँ उन्हें सब बातों का सुख है केवल एकही बातकी कमी बतलाई है, वह यह कि उस लोक में हजामत बनवाने के लिये नाई नहीं मिलता। देखिये इसी से मेरी भी यह दशा हुई। मेरी तो केवल छ महीने में यह हाल है और उनके बाल तो इतने बढ़ गये हैं कि चलना फिरना दूभर हो रहा है। उनके सिर और दाढ़ी के बार जमीन पर लेटते चलते हैं। मेरे चलते समय उन्होंने आपसे एक चतुर नाई भेजने का अनुरोध किया है। मैं उन्हें आपकी तरफ से धीरज देकर आया हूँ। वहाँकी बहुतेरी सामग्रियाँ वे मेरे साथ भेजने वाले थे; परन्तु फिर इस विचार से ठिठक गये कि नाई आने पर उसीके हाथसे भेजा जायगा। मैं उनको एक चतुर नाई तुरत भेजनेका आश्वासन दे आया हूँ। अब भेजना न भेजना आप की इच्छा पर निर्भर