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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद $\qquad$ २१२

न सकेगी। वह बादशाह को सलाम कर अपने घर का रास्ता लिया।" बीरबल भी परछाईं की तरह इसके पीछे पड़ गया था; वह इसकी सारी हरकतों को ध्यानपूर्वक देखता जा रहा था। उसने समझ लिया था कि यह खोटा नाई बात छोड़ने की युक्ति निकाल रहा है। अतएव इसपर बिना सच्ची चौकसी किये काम न चलेगा। बीरबल तो इसकी ताक में लगा ही था; ज्योंही काना नाई दरबार से बाहर निकला, वह अपने एक स्वामिभक्त नौकर को उसके पीछे लगा दिया। काना नाई रास्ते में अनेक प्रकार की युक्ति सोचता विचारता हुआ अपने घर पहुँचा। अपने कुटुम्बके स्त्री पुरुषों से दरबार की सारी बातें समझा कर बोला- "यदि हमलोग गुप्त रीतिसे आज रात में ही नगर को छोड़कर इस राज्य से बाहर निकल चलें तो बीरबल के कुचक्र से जीवन रक्षा हो सकती है।" इसी बीच उसका छोटा लड़का दौड़ता हुआ घर के भीतर आया और अपने पिता (काने नाई) से बोला-"पिता जी आप यहाँ क्या कर रहे हैं, द्वार पर एक सिपाही आकर बैठा है।" नाई का चेहरा फक् हो गया, उसने कहा- "अब निश्चय मरना पड़ा। यह काम उसी बीरबल का जान पड़ता है। इसको भयभीत देख उसकी स्त्री बोली- "स्वामी ! आप इतना डर क्यों रहे हैं; अभी चन्द रोज पहले बीरबल भी तो गया था। जैसे वह काम कर के सजीव लौटा उसी प्रकार आप भी लौट आइयेगा।" काने नाई ने कहा-"तू क्या जाने बीरबल कैसे लौट आया है, उसपर तो देवी की छाया है जिससे बच गया; मैं कदापि नहीं बच सकता। किसी