अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४ सौ गायों के एकमात्र अधिपति आप ही हैं एक दिन तानसेन और बीरबल में कुछ विवाद छिड़गया, वे प्रत्येक अपने २ को एकदूसरे से गुणी बतलाते थे । बादशाहने कहा-“इस प्रकार तुम्हारा विवाद नहीं मिट सकता, इसके लिये किसी को मध्यस्त बनाकर अपना न्याय करा लो ।” वे बोले- “पृथ्वीनाथ ! आपकी आज्ञा हमें सिरोधार्य है । हम दोनों इस बात पर सहमत हैं, परन्तु हमारी बुद्धि में नहीं आता कि हम किसको अपना मध्यस्थ बनावें । कृपया आपही इसका भी निपटारा कर दें । बादशाह ने कहा-“आपलोग महाराणा प्रतापसिंह के पास जावें ।” बीरबल और तानसेन दोनों ही एक साथ प्रतापसिंह से जा मिले। तानसेन तो गायनाचार्य्य था ही, वह वहाँ पहुँचतेही एक रागिनी छेड़ी । बीरबल अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ खामोश बैठा रहा। जब उसने देखा कि तानसेन अपने गान वाद्य से राणा को मोहित कर बाजी मार लिया चाहता है तो बोला- “राणाजी! हम दोनों एकही साथ साही दरबार से चलकर आपके पास आये हैं और हम दोनोंही रास्ते में एक एक अलग अलग मन्नतें मान चुके हैं । मैंने पुष्करजी में पहुँचकर प्रार्थना करी है कि यदि मैं दरबार से मानपत्र प्राप्तकर लौटूँगा तो एकसौ गौ ब्राह्मणों को दान करूँगा और मिया तानसेनजी ने खाजेखिजिर की दरगाह में जाकर अपनी मन्नत की है कि जो मैं राणाजी से प्रसंशापत्र प्राप्त करूँगा तो यहाँ पर एक सौ गौवों की कुरबानी कराऊँगा । सौ गायों की जिन्दगी एकमात्र आपके हाथ है।