अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२१ अकबर बीरबल विनोद दिया तो बीरबल बोला-“हे जगज्जननी जी! मैं अपने मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते २ थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार नाकों को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी। मुझे इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती हुईं अन्तर्धान हो गई। हम दोनों एक साथ आवेंगे एक दिन कोचीन नगर से चलकर दो व्यापारी दिल्ली शहर में आये और घूमते फिरते एक नगर सेठ के पास जापहुँचे। नगर सेठ के सात्विक और सरल स्वभाव को देख कर इनके मन में बेईमानी समाई और उसे ठगने का विचार किया। ये थोड़ेसे आभूषण भी अपने साथ लाये थे, उसे व्यापारीको दिख- लाकर बोले-“आप मेरे इन आभूषणों को बिकवा दें तो हमपर आपका बड़ा उपकार होगा।” व्यापारी आभूषणों को देखकर उत्तर दिया-“आपका कहना बहुत ठीक है, पर यह कोई लड़कों का खेल नहीं है जो इधर बनाया और उधर बिगाड़ दिया। जब मैं इसे कुछ लोगों को दिखलाऊँगा और उन्हें पसन्द आयेगा तब कहीं बिकेगा। आप लोग आभूषणों को मेरे यहाँ छोड़ जाइये, फिर दूसरे दिन दोपहर में आना।”