अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३५ अकबर बीरबलविनोद
“माली बरसन को चहै, धोबी के मन धूप । साई चाहै बोलना, चोर चहै जू चूप ॥” बादशाहको बीरबल का यह युक्तिसंगत दोहा बहुत भला मालूम हुआ, परन्तु वह उससे और भी सरलार्थ चाहते थे इसलिये फिर बोले-“बीरबल ! आपका यह दोहा काटने लायक नहीं है; फिरभी मुझे इससे पूरा सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये कोई दूसरी विधि से और स्पष्ट कर मुझे समझावो । बीरबल ने कहा-“बहुत अच्छा, और यह दूसरा दोहा रचकर पढ़ सुनाया— “अति का भला न बोलना, अति की भली न धूप । अतिका भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥” फिर भी बादशाह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बीरबल से दूसरा उत्तर माँगा। तब बीरबल बोला-“हे पृथ्वीनाथ ! सबका मूलमंत्र यह है कि अपनी अपनी सभी चाहते हैं, मैं इस संबंध का एक दास्तान आपको सुनाता हूँ, शायद उससे आप सन्तुष्ट हो जायें। एक गरीब बापके दो लड़कियाँ थीं। उसने उनमें से एक को तो बागवान के घर ब्याहा और दूसरी को कोंहार से । जब कुछ दिनों के बाद उनसे मिलने गया तो पहले बागवान के घर गया। वहाँ पहुँचकर कुशल प्रश्न के पश्चात् अपनी कन्या का चेहरा उतरा हुआ देखकर उसके सोच का कारण पूछा? वह बोली-“हे पिताजी ! मैं अपने दुःखकी बात आपसे क्या सुनाऊँ । उसका छूटना ईश्वर के हाथ है। इधर कितनेही दिनों से अवर्षण होरहा है। जिस