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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद २४० से पूछे-"बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ ! पेट भरों को सभी ऋतुवें अच्छी होतो हैं, भूखों के लिये एक भी नहीं। यानी सभी बुरी होती हैं।" पीर, बावर्ची भिश्ती-खर एक दिन बादशाह प्रफुल्लित चित्त हो अपने पुत्र को गोदी में लिये हुए खेला रहे थे। इसी बीच बीरबल भी वहाँ आ पहुँचा। बादशाह तुरत पूछ बैठे-"बीरबल ! कोई लावे नर, पीर, बबर्ची, भिश्ती, खर।" बीरबल ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! मैं कल इस सवाल का जवाब ढूढ़कर लाऊँगा। जब संध्या समय वह लौटकर घर जाने लगा तो रास्ते में एक गरीब ब्राह्मण के घर पहुँचा और उसको पाँच रुपये देकर बोला-“ देखो कल तुम्हें दस बजे मेरे साथ दरबार में चलना होगा। अपने खाने पीने का प्रबन्ध कर ठीक समय पर तय्यार रहना।” वह बोला-“बहुत अच्छा, ताबेदार हर एक आज्ञाओं को अक्षरसह पालन करने के लिये तय्यार है।” दूसरे दिन बीरबल ठीक समय पर उसे लेकर दर्बार में हाजिर हुआ। बादशाह ब्राह्मण को देखकर बीरबल का भावार्थ समझ गये और उससे पूछे-"साबित करो कि इस मनुष्य में कलवालेचारो गुण विद्यमान हैं।" बीरबल दोनों हाथ जोड़कर बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह पुजाते समय पीर होता है और ब्राह्मण के हाथ का बनाया भोजन सभी लोग खाते हैं, इस संबंध से बावर्ची है, पौसरा चलाने का काम ब्राह्मण से लिया