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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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पृष्ठ 257

२४३ अकवल बीरवल विनोद़ “बीरबल ! मैंने आज रातमें एक अजीब सपना देखा है,उसका तात्पर्य यह निकलता है कि जो मनुष्य इस हौजमें डुबकी लगा कर एक अण्डा मुरगी का न निकाल लावे उसे दो बाप का समझना चाहिये। मैं केवल तुम्हारी ही बाट देख रहा था। बेहतर है कि सबकी वारी२ से परीक्षा ली जाय। देखें स्वप्न का क्या प्रभाव पड़ता है।” बादशाह की अनुमति से सभी दरबारी हौज में डुबकी मार कर हाथ में एक एक मुरगी का अण्डा लेकर बाहर निकले। जब बीरबल की ओसरी आई तो वह हौज में डुबकी मारकर खाली हाथ निकला। परन्तु उसके मुखारबिन्द से कुकड़ू कूं का शब्द निकल रहा था।” बादशाह ने कहा- मियाँ बीरबल तुम्हारा अण्डा कहाँ है, जल्दी दिखलाओ। बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! तमाम अण्डा देने वाली मुर्गियों के बीच एक मैं ही मुर्गा हूँ। विचारे दरबारी सहम गये और बादशाह के ओठों पर मुस्कुराहट आ गई। कोई धनी और कोई दरिद्र क्यों होता है एक दिन बीरबल और बादशाह में विज्ञान की बातें छिड़ीं थीं। दोनों अपनी अपनीवाली कहते थे, परन्तु उनका मन किसी सिद्धान्त पर स्थिर नहीं होता था इसी बीच बादशाह ने बीरबल से पूछा-“अच्छा बीरबल इसका विवेचन कर सिद्ध करो कि संसार में कोई तो धनी और कोई दरिद्री क्यों हो जाता है?” बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-