अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 292 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
अकबर बीरबल विनोद २४८ वे कभी तुम्हारे यहाँ आते हैं वा तुम ही उनसे मिलने जाया करते हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ ! मैं निगुरी नहीं हूँ, आपकी मेहरबानी से मेरे अनेकों गुरु हैं, परन्तु उसमें भेद केवल इतना ही है कि वे सबके सब बाहर रहते हैं। इसी कारण न कभी यहाँ आते हैं न हमको उनका दर्शन ही मिलता है। थोड़े दिन से मेरे सुनने में आया है कि हमारे एक गुरु यहाँ आ रहे हैं। मुझे उनके रहने का स्थान तक ज्ञात नहीं है, फिर वे बताने ही क्यों लगे उन्हें तो किसी के दाम टके की दरकार नहीं है। वैसे निस्प्रिय गुरु देखने में नहीं आते। यही कारण है कि इस दीनके द्वार पर कभी भी नहीं आने की कृपा करते। बादशाह को ऐसे गुरु से मिलने की इच्छा हुई और वे बीरबल से बोले- “दीवान जी ! जो तुम्हारे गुरु में इतनी विशेषता है तो मैं भी एकबार उनका दर्शन करना चाहता हूँ। हो सके तो जल्दी से जल्दी मुझे उनसे मिलाने का प्रबन्ध करो। बीरबल बोला- “पृथिवीनाथ ! जब आप उनसे मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं तो मैं तत्परता से उनकी खोज कराऊँगा और यदि वे भी आपसे मिलने की इच्छा करेंगे तो मैं अवश्य आपसे उनका साक्षात् करा दूंगा।” बादशाह ने कहा-“मुझे अविलम्ब उनसे मिलाने की चेष्टा करो।” बीरबल बादशाह को तसल्ली देकर वहाँ से बिदा हुआ। घर जाते समय रास्ते में एक वृद्ध लकड़हारे से उसकी मुला- कात हो गई। वह विचारा तमाम परेशानी उठाकर भी आज अपनी सम्पूर्ण लकड़ियों को नहीं बेंच सका था। बीरबलने