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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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२५७ अकबर बीरबल विनोद

योगी का भेष

एक दिन बीरबल के स्पष्ट भाषण से बादशाह बहुत क्रुद्ध हो गये जिसकारण बीरबल गुप्त रूप से परदेश चला गया । वहाँ जाकर उसने वहाँ के लोगों पर अपना ऐसा प्रभाव जमाया कि उस नगर के लोग उसके सेवक होगये। एक तरफ सबका प्रेम और दूसरी तरफ बादशाह की नाराजगी को देख- कर बीरबल वहीं वर्षों गुप्त वास करता रहा। इधर बादशाह की बीरबल के बिना दिनोंदिन बेचैनी बढ़ने लगी। वे बीरबल की तलाश में सब तरफ अपने दूतों को भेजे, परन्तु बीरबल का किसीसे सच्चा समाचार नहीं मिला। उधर जब बीरबल को बादशाह के बेचैनी का समाचार मिला तो वह बादशाह से मिलने के लिये बहुत उत्सुक हुआ और योगी का वेष धारण कर स्वयं दिल्ली पहुँचा। नगर से बाहर एक मंदिर में आसन मार कर भजन भाव करने लगा। यह हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर था, वहाँ नित्य सैकड़ों दर्शनार्थी आया करते थे। उनकी दृष्टि बराबर बीरबल पर पड़ती, परन्तु बीरबल किसी से कुछ बोलता नहीं था। वह चुपचाप आसनमार ईश्वर का गुण गान करता रहा। उसकी ईश्वर में ऐसी निष्ठा देख सबका ध्यान उस योगी के तरफ आकृष्ट हो गया और वे आते जाते बीरबल को दण्ड प्रणाम करने लगे।

बीरबल तो नगर के बहुतेरे गण्यमानों के नाम से परिचित ही था इसलिये प्रसंग चलने पर बड़ी सरलता से उनका नाम ले लेकर सम्बोधन करता, इससे लोगों पर उसके सिद्धताई

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