अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६५ | अकबर बीरबल विनोद एक दिन एक कवि अपनी कविता बनाकर उसके पास ले गया। कवि का अभिप्राय था-"उस धनाढ्य को प्रसन्न करा उससे कुछ धन उपार्जन करना।" परन्तु उसकी सूरत देखते ही सूमड़े का मन पल्टा खा गया। उसने अपने मन में कहा-"यह कवि मुझे अपनी कविता सुनाकर मुझसे धन ठगने आया है, परन्तु इसने मुझे पहचानने में बड़ी भूल की है। अच्छी बात है जिस तरह यह कविता से मुझे प्रसन्न करना चाहता है उसी भाँति मैं भी अपनी मीठी २ बातों से इसे प्रसन्न कर कोरा लौटाऊँगा।" ऐसी युक्ति सोचकर वह धनाढ्य बोला-"कविवर! आपकी कविता तो बड़ी ही उत्कृष्ट है। इसका शब्दालंकार और अनुप्रास का जमक बड़ा ही उत्तम है। मैं अपनी जबान से अधिक क्या कहूँ इसकी जहाँतक विशेषता दिखलाई जाय सब थोड़ी है। कृपाकर आप दूसरे दिन फिर मुझसे मिलियेगा, मैं आपको प्रसन्न कर दूँगा।" उसके ऐसे प्रशंसनीय वाक्यों को सुनकर कवि फूला न समाया और तत्क्षण वहाँ से बिदा हुआ। दूसरे दिन ठीक उसी समय कवि धनाढ्य के पास गया। बात छिपाने के लिये धनाढ्य उसे देखकर अपनी गरदन टेढ़ी कर ली, वह घंटों उससे पुरस्कार पाने की प्रतीक्षा में बैठा रहा अन्त में कोई अर्थ न निकलते देख सेठ के आगे जा खड़ा हुआ। सेठ ने पूछा-"तुम कहाँ के रहने वाले हो और मेरे यहाँ क्यों आये हो?" सेठने इस रुखाई से बात किया मानों उसकी उस कवि से कभी का परिचय ही नहीं था। विचारा कवि बहुत चकराया और मन ही मन देवता पित्तर मनाकर