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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर वीरबल विनोद २७० इसके पीछे पड़ा हुआ था। इसको अपने वश में लाने के लिये उस नीचने बहुतेरा प्रयास किया, परन्तु फिर भी उसे सफ- लता न मिली। ब्राह्मणी के तेज के आगे उसका उद्योग गिरता ही गया। तब उसने दण्ड देकर उसको काबू में लाने की युक्ति निकाली। एक दिन जब कि वह सुन्दरी अपने वस्त्रों को पछारने के लिये नदी तट पर गई थी। यह भी मौका देखकर वहाँ जा पहुँचा। वहाँ और किसी को न देखकर गुप्तरूप से उसके तटपर पड़े वस्त्रों में थोड़ा सा मांस बाँध एक चौकीदार को घूस देकर झूठा मामला खड़ा किया। और वह चौकीदार को सिखला पढ़ाकर भेजा कि वह उस सुशीला पर एक पठान के यहाँ से मांस खरीदने का अभियोग लगाकर उसे गिरफ्तार करलें। जब वह स्त्री अपने कपड़े पछाड़कर बाकी सूखे कपड़ों को उठाया तो उसमें मांस के टुकड़े बँधे हुए देखकर आश्चर्यचकित हो गई। तत्क्षण उस चौकीदार ने उसे जाकर गिरफ्ता कर लिया और बोला- "तू मांस भक्षण करती है इसकारण तुझे बादशाह के पास चलना पड़ेगा।" वह एक तरफ तो तुम्हारी धर्मरक्षा का इतना प्रबन्ध करते हैं दूसरी तरफ तूँ गुप्तरिति से मांस भक्षण करती है और फिर धोखा देकर अपने जात बिरादरी के लोगों को ठगती फिरती है। सिपाही को ऐसा अपवाद लगाते देखकर विचारी अबला किंकर्तव्य विमूढ़सी होकर चुप रह गई। इसी बीच वह दुष्ट पठान जो छिपकर सब देख रहा था चौकीदार के पास उस स्त्रीका पक्षपाती बनकर आया और उस से उसको