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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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१७ अकबर बीरबल विनोद तिसपर मुझे पंडित बनने की बड़ी अभिलाषा है ! अपनी बुद्धि भर प्रयास करके हार गया पर मेरी मनोकामना सफल न हुई। अब लाचार होकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे इसका उपाय बतला कर मेरी जीवन रक्षा कीजिये।” बीरबल ने कहा—“इसमें आपके घबड़ाने की बात नहीं है, इसका उपाय तो बड़ा ही सरल है। जो तुम्हें पंडित कहलाने की इतनी कांक्षा है तो किसी चौराहे पर जाकर खड़े हो जावो, जब तुम्हें कोई पंडित कहकर पुकारे तो उसे मारने दौड़ना, बस फिर देखोगे कि तुम जहाँ २ जावोगे सर्वत्र लोग पंडित ही पंडित पुकारते फिरेंगे।” बीरबल की युक्ति से वह मूर्ख ब्राह्मण बड़ा सन्तुष्ट हुआ। तुरत आगे बढ़कर वह एक चौराहे पर खड़ा होगया। इधर बीरबल भी जा पहुँचा और वहाँ के खेलते हुए छोटे २ लड़कों के कान में कुछ कहकर समझाया। फिर क्या था; चारों तरफ से पंडित २ की आवाज आने लगी और वह उन्हें मारने को दौड़ाने लगा। उस चौमोहानी पर लोगों की भीड़ लग गई। लड़कों की देखा देखी बड़कों ने भी पंडित पुकारना प्रारम्भ कर दिया। ज्यों-ज्यों वह लोगों पर चिढ़ता त्यों-त्यों लोग और भी चिढ़ाते जाते थे। देखा-देखी थोड़े समय में ही वह मूर्ख सर्वत्र पंडित के नाम से ख्यात हो गया। जब उसका मतलब हल हो गया तो बीरबल की अनुमति से क्रमशः चिढ़ना बन्द कर दिया, परन्तु लोगों ने पंडित कहना नहीं छोड़ा ? २