अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल बिनोद २२ लगा है। इन की आपस की ऐसी लड़ाई देखकर मैं इन्हें गिरफ्तार कर सरकार में लाया हूँ, अब आपकी जैसी मरजी हो इनका निपटारा कीजिये।" बादशाह ने उनसे साक्षी माँगी। नगर सौदागर ने कहा- "गरीबपरवर ! आज पाँच वर्ष का अर्सा हुआ कि मैं अपना शहर ईरान छोड़कर दिल्ली आ बसा हूँ और यह हमारा नौकर इससे दो वर्ष पहले ही मुझको छोड़कर भाग गया था। आज जब मैं बाजार में खरीद फरोख्त कर रहा था तो यह भी अचानक वहीं आपहुँचा और मेरा हाथ पकड़ कर बोला- "तू मेरा गुलाम है, तू मेरा गुलाम है।" मेरे व्यापारी होने का सारा शहर साक्षी है।" जब पहला व्यापारी अपना बयान दे चुका तो दूसरा विदेशी व्यापारी बोला- "पृथ्वीनाथ ! यह झूठ बोलता है। क्योंकि ईरान का व्यापारी मैं हूँ। इस शहर में मैं बिल्कुल नया नया आया हूँ; इस कारण यहाँ का एक भी नागरिक मुझे नहीं पहचानता। यह जो इस नगर में शेरअली के नाम से विख्यात हो रहा है सो इसका फर्जी नाम है। यह "नसीबा" नामी मेरा गुलाम है। सात वर्ष का जमाना गुजरा जब मैं इसे दूकान पर छोड़ बाहर व्यापार के लिये गया था। मौका देख यह मेरी बहुत बड़ी रकम चुराकर भाग आया है। तभी से मैं इसकी खोज में दरदर ढूँढ़ता फिरता हूँ। आज सात वर्षों के बाद यहाँ मिला है।" इनका अभियोग दरबार के सभी लोग बड़े गौर से सुने रहे थे, मामला भी बड़ा पेचीदा जान पड़ता था, दोनों ही सौदागर के लिबास में थे और दोनों की मुखाकृति