भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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२६ Akbar Birbal Binod अकबर बीरबल बिनोद

बीच में ही काट कर बोली-"बीरबल ! तुमको मैं भलीभाँति जानती हूँ, मेरा दृढ़ विश्वास है कि चाहे बादशाह तुम से भले ही नाखुश हों, परन्तु उनको मना लेना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है ! बेगम की इस युक्तिसंगत बात को सुनकर बीरबल खुश होकर उसके कार्यसाधन के निमित्त दश हजार रुपये की माँग पेश की । उसे तत्क्षण दशहजार की थैली समर्पण की गई । बीरबल घर पहुँचकर एक सुनार को बुलवाया वह अपने काम का बड़ा पक्का था । वीरबल उसको रुपये की एक थैली देकर बोला-"सेठजी मुझे मोती मंडित सुवर्ण का एक जव की बाली दर्कार है, इसलिये आप उत्तम २ मोतियों को बाजार से संग्रह कर उन्हें सोने में इस प्रकार जड़ो कि देखने में हूबहू जव की बाली ही जान पड़े ।” सुनार कुछ कालोपरान्त एक उत्कृष्ट बाली बना लाया । बीरबल उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे कुछ द्रव्य इनाम में देकर बिदा किया। आप उस बाली को लेकर बादशाह के महल की तरफ चला । दर्बार में पहुँचते।पहुँचते आधा दिन ढल गया । पहरेदारों से अपने आने का सन्देशा बादशाह के पास यह भेजा कि-“पृथ्वीनाथ ! मैं एक बड़े आवश्यक कार्यवश आपसे मिलने आया हूँ यदि आज्ञा हो तो अन्दर आऊँ ।” बादशाह ने आज्ञा देकर बीरबल को दर्बार में बुलवा लिया । बीरवल बादशाह के पास पहुँचकर नियम अनुसार सलाम कर बगल में बैठ गया और मोती उसके हाथ में देकर बोला-