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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल बिनोद ३२ लोगों ने इस बात की साक्षी दी है कि उनको वायु नहीं सरती तो बड़े अफसोस की बात है कि बीज बोने के लिये कोई तैयार क्यों नहीं होता। श्रीमान को भी वायु नहीं सरती अतएव अब इस काम को स्वयं आपही करें तो कितना उत्तम हो। बादशाह बीरबल के प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मुझे भी तो वायु सरती है। इस संसार में ऐसा एक भी मनुष्य न निकलेगा जिसे वायु न सरती हो। तब बीरबल ने मौका देखकर कहा-“पृथ्वीनाथ ! जब यही बात है तो बेगम और मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया था जिसके लिये हम दंडित किये गये। बीरबल की इस युक्ति से बादशाह का गुस्सा शान्त हो गया और बेगम को महल में बुलवाने की आज्ञा दी। बीरबल भी दीवान पद पर नियुक्त किया गया। नया कौतुक । अकबर बादशाह को ठट्ठेबाजी का बड़ा शौक था और दैवयोग से बीरबल भी बड़ा ठट्ठेबाज था। एक दिन बादशाह और बीरबल में ठट्ठेबाजी हो रही थी बादशाह ने कहा-“बीर- बल बहुत दिन हुआ कोई नया कौतुक तुमने मुझे नहीं दिखलाया अतएव अब कोई ऐसा नवीन कौतुक दिखलाओ जैसा फिर कभी देखने में न आवे ।” बीरबल हँसते हुये बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य की और बोला-“हुजूर इसमें कोई कठिनता की बात नहीं है परन्तु उसकी तैयारी करने में

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