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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद ३८ उसकी बिखरी लटें स्याही काली नागिन के समान लपलपा रही हैं। आदि आदि कई प्रकार के चकमें देकर बड़ी मुलायमी से पूछा-“क्यों; वे सब बातें अब तक आप लोगों को दिखलाई पड़ीं वा नहीं, यदि न दीख पड़ती हों तो अभी मोका है उन्हें भली भाँति देखलें, ये सब बातें आप लोगों को बादशाह से कहनी पड़ेंगी। फिर किसी प्रकार हीला हवाली करने से काम न चलेगा। बीरबल के साथ एक से एक सुप्रतिष्ठित नागरिक और दरबारी भेजे गये थे, वे ऐसी कौतूहल भरी वार्ता सुन मन में कहने लगे-“हो न हो यह बीरबल प्रेत होकर आया हो ! क्योंकि सिवा महल के इसकी बतलाई एक बात भी हमें नहीं दीख पड़तीं। बीरबल के बारंबार पूछने पर उन लोगों ने एक स्वर से कहा-“अफसोस हमें सिवा महलके और कुछ भी नहीं दीख पड़ता।” तब बीरबल बोला-“आप लोग क्षमा करेंगे, मैं पहले आप लोगों से एक बात कहना भूल गया था, वह यह कि इस लोक के मनुष्य अधिक तर पाप कर्म में रत हैं, दूसरे बहुत से लोग वर्णशंकर भी हो गये हैं इसलिये इन दोनों श्रेणी के मनुष्यों के अतिरिक्त बाकी लोगों को ही ये स्व- र्गीय चीजें दीख पड़ेंगी। एक बार फिर से देखकर आप लोग सत्यासत्य का निर्णय कर लें।” बीरबल फिर पहले की तरह सबको दिखलाना शुरू किया। इस बार लोग बड़ीसत- र्कता से देख रहे थे, पर कुछ हो तब तो दिखलाई पड़े, सिवा महल के उनकी दृष्टि में और कुछ भी न आया। परन्तु वर्णशंकर बनने के भय से सब लोगों ने परी का दिखलाई