अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद ४४ देखकर लोगों का हँसी आने लगी, परन्तु समय हँसने के विपरीत था इसलिये लागों ने उसे प्रगट नहीं होने दिया। हँसकर वर्णशंकर बनना किसी को मंजूर नहीं था—"भाई तू भी चुप, मैं भी चुप।" नये दीवान के नग्न हो जाने पर बीरबल ने बारी-बारी सबको नग्न कर दिया। क्या कहना था दरबार का दरबार नगोठिया हो गया; बादशाह मन ही मन आन की तान सोचता रहा अन्त में उसकी हृदय तंत्री बोली- "भाई स्वर्गीय चरित्र बड़े ही अद्भुत हैं।" तब बादशाह ने बीरबल से पूछा—"क्यों साहब अब तक लोग स्वर्गीय पोशाक पहन चुके वा नहीं?" "बीरबल ने उत्तर दिया"-जी हाँ, अब सब लोग एक दम कपड़े लत्ते से लैस हैं, परन्तु एकाएक वहाँ (परी के पास) सबको न लिवा चलकर पहले मैं उसकी अनुमति ले लेना उत्तम समझता हूँ; आप लोग यहीं ठहरे मैं उसकी स्वीकृति लेकर तत्काल लौट आता हूँ। बीरबल बगल के एक कमरे में भीतर से सिटकना बन्द कर छिप रहा, कुछ समय बिताकर बाहर निकला और बादशाह से प्रार्थना कर बोला—"गरीबपरवर ! परी की ऐसी अनुमति है कि यह दिन का समय है, इस वक्त सब लोग वापस जावें रात्रि में मुझसे मिल सकते हैं। उसने एक बात और भी कहा है-"अपने मालिक से बोलना कि मुझे इस पहाड़ो की आबहवा बड़ी सुहावनी और निरोग जान पड़ती है इसलिये कुछ दिनों तक मेरा यहीं रहने का विचार है। मैं पहले से बादशाह की हो चुकी हूँ तदर्थ किसी न किसी दिन उनसे