अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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युक्ति निकालो जिससे शास्त्रानुकूल सुख प्राप्त हो। "गतानि शोचानि कृतन्न भवन्ते।" अब बीती बातों की चिन्तना छोड़ आगे के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये। सुदामा मित्र बोला-"आप पंडित और ज्ञानी हैं, मैं केवल आपका अनुयायी सेवक हूँ; शास्त्रों के आदेश क्या हैं इसका मुझे कोई गम नहीं, तब इसमें आपही को कोई सोच विचार कर दूसरा उपाय निकालना चाहिये। सुशर्मा बोला-"हाँ एक मार्ग है, परन्तु जबतक तुम उससे सहमत न हो मैं कैसे कर सकता हूँ। शास्त्रों में ऐसा प्रमाण मिलता है कि जो प्राणी त्रिवेणी के तटपर बैठकर आत्म विसर्जन करता है उसको आत्महत्या का पाप नहीं लगता बल्कि अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।" सुदामा नाई पंडित सुशर्मा की इस सम्मति से सहमत हो गया और वे अपने सामानों का अलग २ दो गट्ठर बनाकर एक जगह गाड़कर चलता हुये। वहाँ से चलकर जगत जननी भागीरथी के तटपर आये। सुशर्मा के मन में राज सुख प्राप्ति की काँक्षा थी इसलिये वह पृथिवी मंडल का एकछत्र राज्य प्राप्ति के निमित्त और सुदामा को राज कर्मचारी होने की कांक्षा थी अतएव उसने मंत्री पद की अभिरुचि से त्रिवेणी जी के पवित्र जल में प्राण विसर्जन किया। वे मरती समय ध्यानमग्न हो ईश्वर से प्रार्थना कर बोले-"भगवन् ! इसी जन्म के समान पुनर्जन्म में भी हमारा साथ इसी प्रकार बना रहे और इस समय की सब बातें हमें स्मरण रहें। तीर्थ राज प्रयाग की भूमि जिसमें त्रिवेणी जल का प्रभाव क्या कहना, उस