अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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नवीन घटना थी, सुनकर बादशाह दंग हो गया । वह इस सौदागर को भलीभाँति जानता था, वह दिल्ली नगर का बहुत प्राचीन व्योपारी था । उसने अनेक अवसरों पर अपना तन धन लगाकर सरकारी सहायता की थी जिस कारण बाद- शाह को उसकी दशा पर बड़ी तर्श आई और उसकी रक्षा का भार स्वयं अपने शिर लिया । तत्क्षण साहूकार को घर जाने की आज्ञा देकर आप दीवानखाने में पहुँचे । बीरबल स्वागत के लिये अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बादशाह उसकी बगल में एक कुर्सी पर जा बैठे । दोनों में अन्तरंग गोष्ठी होने लगी । बादशाह बीरबल को दीनदयाल का सारा कच्चा चिट्ठा सुना कर बोला-"बीरबल ! इस साहूकार का न्याय ऐसी युक्ति से करो, जिसमें उसकी जान बचे और अन्याय भी न हो, मैं इसकी दैन्य दशा पर बड़ा चिन्तित हो रहा हूँ । बीरबल बोला-"पृथ्वीनाथ ! चिन्ता करने की कोई बात नहीं है आपकी आज्ञा का यथोचित पालन करूँगा । उधर वे बीरबल को समझा कर अपनी सभा में पहुँचे इधर बीरबल उसके छुट- कारे की तरकीब सोचने लगा । एकाएक उसका चेहरा प्रफु- ल्लित हो गया और फिर अपने कार्य में दत्तचित्त हुआ । उधर केशवदास मारवाड़ी को भी नींद नहीं आती थी, वह तो दीनदयाल के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ था पाँच छः दिनों की मुहलत देकर फिर बादशाह की अदालत में दावा दायर किया-"शर्त के मुवाफिक अदालत दीनदयाल से उसके शरीर का एक सेर मांस दिलवा दे ।" बीरबल इस अभियोग ५