आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ११३ ६५ बचन हमारे पर आई है मारैं कौन पारपर भाय ११४ आल्हा बोलैं तब मलखेते तुम सुनिलेउ हमारी ज्वान ॥ खैंचि सिरोही को कम्मरसे तुम यहि मरो बीरमलखान११५ सुनिकै बातें ये आल्हाकी मलखे रामचन्द्र को ध्याय ॥ खैंचिकै मारा रनि बिजमा को सो तहँ परी पछारखाय ११६ ऊदन दौरे त्यहि समया में गोदी तुरत लीन बैठाय ॥ आँसुन भिज्यो रनिबिजमाको धीरजदीन लहुरवाभाय ११७ यह नहिं जानत हम प्यारी थे तुमका मारैं बीर मलखान ॥ जेठे भाई मेरे मलखे हैं तिनसों काहकरौं मैदान ११८ और जो मारत कोउक्षत्री त्वहि तौ मैं कटा देत करवाय ॥ अब बसमेरो कछु प्यारी नहिं हैयहहु पितासरिस बड़भाय११६ धर्म पतिब्रत त्वर साँचो है हमरे मोह गयो मनछाय॥ अबकीबिछुुरी फिरिकबमिलिहौ साँचे हाल देउ बतलाय १२० सुनिकै बातें ये ऊदन की बिजमा बोली बचन सुनाय ॥ भोग बिलासै के कारण से संगिनिभइँनिपियातवआय१२१ जेठ हमारे मलखे लागैं तिन म्वहिं भुइँमादीनस्ववाय॥ मारे मलखे तहँ तुम जावो जहाँ न होय लहुरवाभाय१२२ शापित करिकै मलखाने को बिजमा बोली बचन उदार ॥ बेटी हैवे हम नरपति की फुलवा होई नाम हमार १२३ घोड़ खरीदन काबुल जैहौ तबहम मिलब तुम्हें सरदार ॥ यह तो देही हियनै रहि है नरवर लेव और अवतार १२४ इतना कहिकै रानी बिजमा औ मरिगई तड़ाका भाय ॥ लाश उठाई बघऊदन ने औ नर्मदा बहाई जाय १२५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥